Abstract
भारतीय बाल साहित्य हमारी प्राचीन विरासत है। यह एक तथ्य है कि भारत में 'बाल साहित्य' शब्द पश्चिम से आया है, लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि बाल साहित्य हमारे पास पश्चिम से आया है? भारत के प्राचीन साहित्य — पंचतंत्र, हितोपदेश — में हमें बाल साहित्य के अवशेष मिलते हैं। भारत में हम व्यक्ति, समाज, संस्कृति, साहित्य आदि में वैश्विकता देखते हैं। इस शोध पत्र में भारतीय बाल कहानियों में वैश्विकता कैसे दिखती है, भारत की धरती पर जिस तरह से एक बच्चे का पालन-पोषण होता है वह दुनिया के बच्चों के लिए कैसे उपयोगी होगा, हमारी कहानियों से दुनिया के बच्चे कैसे बड़े हुए, दुनिया ने भारतीय बाल साहित्य से क्या लिया — इन सभी का अध्ययन इस शोध लेख में किया गया है। भारतीय बालकथाएँ न केवल बच्चों के लिए मनोरंजन का माध्यम रही हैं, बल्कि जीवन के नैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं की भी शिक्षा देती रही हैं। पंचतंत्र, हितोपदेश और जटायुकथा जैसे ग्रंथों में बाल साहित्य के प्राचीन स्वरूप के उदाहरण देखे जा सकते हैं। भारतीय बाल साहित्य की वैश्विकता न केवल भारतीय समाज, बल्कि पूरी दुनिया के बच्चों के जीवन में एक सकारात्मक बदलाव लाने में सक्षम है।
Keywords
Authors
- डॉ. रश्मिकाबेन भीखाभाई भोई(corresponding author)
Maharaja Sayajirao University of Baroda, Vadodara, Gujarat, India, India
How to cite
भोई, ड. र. भ. (2026). भारतीय बालकथाओं का वैश्विक दृष्टिकोण से अभ्यास. Viśvasaṃvid, 1(1), 89-95.
